प्रारंभिक जीवन
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर सन 1869 को हुआ था |
गुजरात के पोरबंदर नामक जगह पर हुआ था इनके पिता का नाम करमचंद गांधी और मां का नाम पुतलीबाई था
करमचंद गांधी पोरबंदर में दीवान के पद पर आसीन थे
गांधी के जीवन में उनकी माता का सबसे अधिक प्रभाव था |
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विवाह —-
करमचंद गांधी
का विवाह 13 वर्ष की उम्र
में 1883 कर दिया गया था
उनकी पत्नी का नाम कस्तूरबा था वह उस समय 13 वर्ष की थी
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उन्होंने हर परिस्थिति में अहिंसा और सत्य का पालन किया और लोगों से भी कहा कि वे सत्य की राह पर चले |
वे सदैव शाकाहारी भोजन खाने वाले व्यक्ति थे , उनका जीवन साधारण था |
वे आत्मसिद्धि उपवास भी रखते थे | उनका पहनावा काफी साधारण था वे धोती और सूती शाल पहनते थे |
करमचंद गांधी के चार बेटे थे हरिलाल ,मनीलाल,रामदास देवदास
शिक्षा —
करमचंद गांधी की शिक्षा पोरबंदर में हुई |
जब वे 7 साल के थे तब उनका परिवार राजकोट में आकर बस गया | यहां उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण की और बाद में फिर हाई स्कूल में प्रवेश लिया |
गांधी जी ने खुद को गणित में कमजोर पाया वे शर्मीले और कम बुद्धि वाले छात्र हुआ करते थे | इन्हें एकांत बहुत पसंद था, वह बहुत आज्ञाकारी थे |
कमजोर छात्र होने के बाद भी उन्होंने मेहनत करके अपनी कक्षा उत्तीर्ण की ,उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था |
एक बार जब गांधी ने हरिश्चंद्र एक नाटक को देखा तो उन्होंने सत्य की राह चलने पर की कसम खायी , राजा हरिश्चंद्र के जीवन को देखकर हमेशा सत्य की राह पर चले |
करमचंद गांधी स्कूल में अंग्रेजी के अच्छे विद्यार्थी और गणित में कमजोर थे |
सन 1887 में मैट्रिक पास करके गांधीजी ने भावनगर के समलदास कॉलेज मैं दाखिला लिया और डिग्री प्राप्त की |
फिर वकालत पढ़ने के लिए लंदन के लिए रवाना हुए जहां उन्होंने वकालत की पढ़ाई की
लंदन —
सन 1888 में गांधी वकालत की पढ़ाई करने के लिए ब्रिटेन गए,
1891 में गांधी वकालत की पढ़ाई करके भारत लौट आए |
इसी वर्ष गांधी की माताजी का निधन भी हुआ था , उन्हें इस बात का बहुत दुख हुआ उनके जीवन में सबसे अधिक प्रभाव उनकी माता का ही रहा था |
इसके बाद उन्होंने बम्बई तथा राजकोट में वकालत आरंभ की , गांधी जब वकालत करने लगे तो वह अपना पहला केस हर गए थे ,
उन्होंने कोशिश की लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वह कोशिश करते रहे |
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दक्षिण अफ्रीका —–
[caption id="attachment_390" align="aligncenter" width="300"] दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी
सन् 1893 में 2 साल बाद गांधीजी को उम्मीद की एक किरण दिखाई दी जब उन्हें दक्षिण अफ्रीका में अपना एक केस लेकर जाने का मौका मिला ,
और यह साबित किया कि कभी हार नहीं माननी चाहिए और उन्होंने वहां जाकर साबित किया कि कोई भी काम करने की इच्छा हो तो कोशिश करने से पूरा होता है|
गांधी सन् 1893 में सेठ अब्दुल्लाह जो एक गुजराती व्यापारी थे उनके एक केस के मामले में वकील बन गए जो की एक कानूनी विवाद था |
लेकिन जहां भारतीयों के साथ भेदभाव होता था ,यह देखकर गांधी विचलित हो गए और उन्होंने इस भेदभाव को समाप्त करने का फैसला लिया |
डरबन यात्रा के दौरान गांधी खुद इसका शिकार होते हुए पाया गया और उनके साथ घटित हुई दो घटनाओं ने उनके इरादे को और मजबूत किया |
अब्दुल्ला के निमंत्रण पर गांधी पानी के जहाज में बैठकर दक्षिण अफ्रीका गये इस
यात्रा के दौरान गांधी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा|गोरे काले का भेदभाव सहना पड़ा और इन घटनाओं ने उन्हें सत्याग्रह करने पर मजबूर किया |
जब आप बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी बन गए थे वह कई मामलों में सफल भी हो गए थे |
और उन्हें यहाँ सत्याग्रह के दौरान वहां जेल भी जाना पड़ा उन पर जमकर कोड़े बरसाए गये | अपने नागरिक अधिकारों के लिए दक्षिण अफ्रीका में लड़ते रहे|
सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ा
सात साल के इस आंदोलन को चलाने के बाद गांधीजी की मेहनत रंग लाई और अंत में दक्षिण अफ्रीकी सरकार समझौते की मेज पर आई |
आंदोलन के दौरान गांधीजी को कई बार जेल जाना पड़ा उन्होंने कभी हार नहीं मानी ,और सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरा करके भारत लौटी लौटे |
दक्षिण अफ्रीका गांधीजी एक साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर गये थे |
सन 1913 में ही गांधीजी ने बंधुआ मजदूरों के कारण वहां की सरकार के इस कदम का विरोध किया था |
सन 1914 गांधी जी भारत वापस आए तो उन्होंने राजकोट में अपना दफ्तर खोला और अर्जिया लिखने का काम किया करते थे उनकी आमदनी ₹300 प्रतिमाह थी |
गांधी जी द्वारा चलाए गए आंदोलन :—-
चंपारण आंदोलन
चंपारण आंदोलन
सन 1917 और 1918 के बीच गांधी के नेतृत्व में बिहार के चंपारण जिले में हुआ था महात्मा गांधी का यह भारत के में किया गया पहला सत्याग्रह था यह सत्याग्रह चंपारण सत्याग्रह के नाम से जाना है |
अंग्रेजों द्वारा और उनके पिट्ठू जमीदारों ने भूमिहीन मजदूरों एवं गरीब किसानों को खाद्यान्न के बजाय नील और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिए मजबूर किया |
गांधी जी ने बिहार में चंपारण जिले में पहुंचकर वहां अंग्रेजों द्वारा हो रहे अत्याचार के खिलाफ आंदोलन का शंखनाद किया |
गांधी जी ने जमीदारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और हड़तालो का नेतृत्व किया , उनके समर्थन में हजारों की संख्या में किसान एकत्रित हो गये |
पुलिस ने उन्हें जिला छोड़ने को कहा लेकिन आदेश मानने से इंकार कर दिया और इस तरह के लोगों का सत्याग्रह आंदोलन करके अंग्रेजों का अंग्रेजों को हराया था गरीब किसानों को बचाया था |
सन 1920 में असहयोग आंदोलन —-
सितंबर 1920 से फरवरी 1922 के बीच में गांधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया था |
जलियांवाला बाग नरसंहार सहित अनेकों घटनाओं के बाद गांधी जी ने अनुभव किया कि ब्रिटिश सरकार के हाथों उन्हें उचित न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं है |
इसलिए उन्होंने यह की योजना बनाई के ब्रिटिश सरकार से सहयोग वापस लेना है |
यह आंदोलन गांधी जी का अत्यंत सफल रहा क्योंकि इस आंदोलन में गांधीजी को साथ लाखों लोगों का साथ मिला |
इस असहयोग आंदोलन से ब्रिटिश सरकार हिल गये |
नमक सत्याग्रह —
12 मार्च सन 1930 में बापू ने अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम में दांडी गांव तक 24 दिनों तक पैदल मार्च निकाला था |
उस समय अंग्रेजों ने चाय , कपड़ा और नमक तक पर अपना एकाधिकार स्थापित कर रखा था |
दांडी मार्च को दांडी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है नमक सत्याग्रह गांधी जी के प्रमुख आंदोलनों में से एक था |
दांडी यात्रा का भी नमक सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने में बहुत बड़ा योगदान था
गांधी जी ने इस सत्याग्रह के चलते उस समय दांडी में नमक बनाकर अंग्रेजों के कानून को तोड़ा था |
गांधीजी का नमक सत्याग्रह आंदोलन सफल रहा था उस समय भारतीयों को नमक बनाने की इजाजत नहीं थी लेकिन 24 दिनों की दांडी यात्रा समुद्र के किनारे पहुंची
जहां पर उन्होंने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा |
गांधीजी को इस यात्रा के दौरान प्रेस का भी बड़ा कवरेज मिला जिसने पूरे देश में आजादी की लहर उठा दी |
दलित आंदोलन —
हिंदू समाज में जिन जातियों के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार अतः छुआछूत का व्यवहार देखने और सुनने में आता है | उनको अस्पृश्यता या दलित के नाम से पुकारते थे |
यह देख कर के सारे नाम अपमानजनक है , सन 1932 के अंत में गुजरात के दलित ने गांधी को एक गुजराती भवन का हवाला देकर लिखा था कि “हरिजन” नाम दिया जाये |
गांधी जी ने यह नाम पसंद कर लिया था और यह नाम प्रचलित हो गया |
कई ऋषि-मुनियों बुद्ध एवं महावीर ने , कितने साधु-संतों ने तथा राजा राममोहन राय स्वामी विवेकानंद सरस्वती प्रभाती समाज सुधारको ने इस सामाजिक बुराई की ओर हिन्दू समाज का ध्यान खींचा और इसे मिटाने के लिए प्रयत्न किया किंतु सबसे जोरदार प्रयत्न महात्मा गांधी जी का था |
भारत छोड़ो आंदोलन —

“भारत छोड़ो आंदोलन” देश का सबसे बड़ा आंदोलन था जिसकी वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा, इस आंदोलन के कारण भारत को आजादी मिली,
यह आंदोलन ऐसे समय में शुरू हुआ जब दुनिया काफी बदलाव के दौर से गुजर रही थी |
एक तरफ भारत महात्मा गांधी की नेतृत्व की आशा कर रहा था और दूसरी तरफ सुभाष चंद्र बोस भारत को आजाद कराने के लिए फौज तैयार कर रहे थे |
अगस्त 1942 को बंबई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव पारित किया गया |
अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन असफल होने के 4 महीने बाद ही स्वतंत्रता के लिए भारत का तीसरा जन आंदोलन आरंभ हो गया
इसे भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना गया |
भारत छोड़ो आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुआ था |
जिसे अगस्त क्रांति भी बोला जाता है |
यह भारत को तुरंत आजाद करने के लिए एक सविनय अवज्ञा आंदोलन था |
भारत छोड़ो का नारा युसूफ मेहर अली ने दिया था |
भारतीय नेशनल कमेटी की बैठक में इस आंदोलन को बहुत ही गंभीर तरीके से लिया और हर हाल में अंग्रेजों को भारत छोड़ने की योजना बनाई |
यह आंदोलन सबसे विशाल और सबसे तीव्र आंदोलन साबित हुआ जिसके कारण ब्रिटिश राज की पूरी नीव हिल गई थी , आंदोलन शुरू करते समय गांधीजी ने कहा कि मैंने कोंग्रस को बाजी पर लगा दिया |
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ही कई नेता जयप्रकाश नारायण , अरूणा , आसफ अली , डॉ राम मनोहर लोहिया आदि उभर कर आये |
1943 के अंत तक इस आंदोलन को कम सफलता मिली पर भारत को संगठित कर दिया गया |
ब्रिटिश सरकार ने सत्ता का हस्तांतरण भारतीयों के हाथ में सौंपने का फैसला लिया और इस समय गांधी जी ने आंदोलन बंद कर दिया |
और कांग्रेसी नेताओं सहित एक लाख राजनीतिक बंदियों को रिहा किया गया रिहा कर दिया गया |
कहा जाता है कि इस आंदोलन की व्यापकता देखकर अंग्रेजों को विश्वास हो गया कि उन्हें छोड़कर जाना पड़ेगा |
गांधी जी की हत्या —
मोहनदास करमचंद गांधी जो अब बापू के नाम से जाने जाते थे 30 जनवरी 1948 में नाथूराम गोडसे नमक हत्यारे ने हत्या कर दी |
गांधी जी की हत्या हुई तो हर साल के 71 साल के थे |
उस समय दिल्ली में बंटवारे की वजह से हालात सामान्य नहीं थे उनसे मिलने कोई ना कोई आता रहता था | अतः बापू परेशान भी रहते थे |
30 जनवरी गांधी जी ने सरदार वल्लभभाई पटेल से मुलाकात की , शाम को 5:00 बजे प्रार्थना सभा में शामिल होना था लेकिन पहुंचने में देरी हो गई 15 मिनट की देरी से पहुंचे |
हालांकि अब गांधी जी सभा में जा रहे थे तो उनके दोनों तरफ लोग थे उसी भीड़ में नाथूराम गोडसे नामक हत्यारा भी शामिल था उसने अपने पास रिवाल्वर रखी हुई थी |
पहले गांधी जी को नमस्कार किया फिर उन पर गोलियां चला दी |
भारत ने महात्मा गांधी जैसा देशभक्त एक नाथूराम गोडसे नामक गद्दार के हाथो हत्या किये जान से खो दिया |
उनके अंतिम शब्द “हे राम” थे |
उनकी मृत्यु देश के लिए बहुत बड़ा नुकसान था |